देवता और किसान – क्रश्न चन्दर

 

I’ve had a shot at translating Krishan Chander’s Devta Aur Kisaan, a short story from 1983.  Chander (1914-1977) was described by Dawn as ‘one of the great pillars of the Progressive Writers’ Association (PWA) and one of the leading short story writers of the Indian subcontinent in the second half of the 20th century’.  Scroll down for the English.

 

देवता और किसान

क्रश्न चन्दर

यह उन दिनों की बात है जब देगता मानव जाती में निवास करते थे| बोलते-चालते और खाते-पीते थे| सॅंकट के समय जनता की सहायता करते थे| लोगों में उनका बड़ा आदर-सम्मान था| वे अपनी बुध्दि और प्रतिभा के कारण पूजे जाते थे| जनता अपना हर दुःख उनके पास ले जाती| क्योंकि उस समय देवता इंसानों से दूर ना थे|

उन्हीं दिनों चक ढोढा कलाँ नम्बर २१८ जिला होशियारपुर में एक पीपल के पेड़ तले एक देवता रहता था, उसका नाम गुजगुज था| वह अपने शरीर पर राख की जगह सिन्दूर की भभूत मालता था| और पीपल के पेड़ तले बैठे उस देवता के पण्डे का लाल रंग दूर-दूर तक लोगों को नज़र आता था| जब भी कोई बड़ा संकेट आ पड़ता, लोग दौड़े-दौड़े उसके पास आते, सीस नवाते, फूल चढ़ाते, और उससे वरदान पाते| आस-पास की बस्तियों में और भी देवता थे किन्तु उन सबकी आपेक्ष गुजगुज ही अधिक प्रसिध्द और लोकप्रिय था| अधिकतर लोग उसी के पास जाते थे|

उस समय चक ढोढा कलाँ नम्बर २१८ जिला होशियापुर में एक निर्धन क्रषक रहता था| वह धन-दौलत के दृष्टिकोण से तो दरिद्र था ही, स्वाभाव का भी अत्यन्त सरल और आज्ञाकारी था| सदा सिर झुकाकर चलता| बड़ों का आदर करता| बात करता तो बड़े मधुर और विनम्रतापूर्ण स्वर में| आज तक किसी ने उसके मुँह से एक गली तक नहीं सुनी थी| गाँव में उसकी भूमि सबसे कम थी| बैलों की एक जोड़ी के सिवा और कोई सम्पत्ति उसके पास ना थी| उसका छप्पर भी सबसे छोटा था| फिर भी उसके मुख से क्सिी ने कृतज्ञता और धैर्य-सन्तोष से भरे शब्दों के अतिरिक्त और कुछ न सुना था| वह बड़ा परिश्रमी और सदाचारी व्यक्ति था| और अपनी छोटी-सी खेती-बाड़ी में अपने छोटे-से घर और अपने प्यारे बीबी-बच्चों में मग्न था| गुजगुज देवता उससे बहुत खुश था| और लोगों को समझते समय अक्सर उसकी मिसालें दिया करता था|

फिर एक दिन क्या हुआ की वह किसान एक तपती दोपहर में देवता के चरणों में उपस्थित हुआ| और हाथ जोड़कर कहने लगा—

“महाराज!  मुझ पर घोर अन्याय हुआ है| एक भिषण टिड्डी-दल आया और मेरे सारे खेतों को ख गया| वह टिड्डी-दल किसी और कृषक के खेतों में नहीं बैठा| उसने केवल मेरे खेतों पर आक्रमण किया और मेरी सारी हरी-भरी फसल उजाड़ गया| महाराज!  मैं लुट गया, उजड़ गया, बरबाद हो गया| अब मैं और मेरी बीवी-बच्चे क्या खाएँगे?”

देवता गुजगुज ने किसान की फ़रियाद सुनकर अपनी आँखों खोलीं और सन्तुष्ट स्वर में बोला—

“जब टिड्डी-दल तेरे खेत खाकर उड़ा जा राहा था तो क्या तूने उस समय आकाश पर मँडराते बादलों की नहीं देखा था जो अपने सीने में नई ऋतु और नये यौवन का सन्देश लेकर आते हैं?”

 

किसान निरुत्तर रह गया और देवता के चरण छूकर चला गया|

एक साल बाद किसान फिर अपने बाल नोचता और चिल्लाता हुआ देवता के सम्मुख हाथ बाँध खड़ा था| और रो-रोकर कह रहा था—

“गुजगुज देवता!  नदी में बाढ़ आ गई, किसी का छप्पर टूटा, किसी का बैल डूब गया किन्तु बाढ़ मेरे तीनों खेतों को बहाकर ले गई| महाराज!  मेरे पास धन के वही तीन खेत थे| अब मेरे बच्चे, चावल के एक-एक दाने को तरसेंगे|”

देवता बोले—”जो धान नहीं उगा सकते, वह पक्का ज्वार और गेंहूँ उगाते हैं और अपना पेट भरके भगवान का शुक्र अदा करते हैं|”

देवता की बात सुनकर किसान सन्तुष्ट हो गया और सिर झुकाकर वापस चला गया|

 

दो साल बाद किसान के दोनों बच्चे हैजे में मर गये| एक लड़का था, दूसरी लड़की| किसान दोनों की लाशें अपनी छाती से लगाए फूट-फूटकर रोता हुआ देवता के पास आया और हाथ जोड़कर डूबे स्वर में बोला—

“मेरे दोनों बच्चे मर गये महाराज!  मेरे दोनों बच्चे मर गये!  भगवान के लिए उन्हें जीवित कर दो|”

गुजगुजा देवता ने कहा—”जो मार जाते हैं, वे जीवित नहीं होते| मौत सबके लए है| अन्त में मौत का दुःख सब भूल जाते हैं|”

“हाय!  मैं लावारिस रह गया| गुजगुज देवता!”  किसान रोते हुए बोला—”मेरे दोनों बच्चे मार गये|”

गुजगुज देवता ने तीखी दृष्टि से किसान की ओर देखा और बोले—

“भारी बरसात में तो बंज़र से बंज़र धरती पर फूल खिल आते हैं और तेरी धर्मपत्नी तो जवान है, सुन्दर है और कोख वाली है|”

देवता के उत्तर पर किसान अवाक् रह गया| परन्तु उसकी आत्मा सन्तुष्ट ने हुई| वह अपने मुर्दा बच्चों की लाशें छाती से लगाए वापस चला गया|

 

छः साल से आधिक न बीते होंगे की वह फिर देवता के चरणों में उपस्थित था और धाड़ें मार-मारकर रो रहा था| आँसू उसकी आँखों से जारी थे|

“क्या है?”  देवता ने उससे पूछा|

“मेरी बीवी—” किसान ने आँसुओं से भीगे चेहरे को देवता के चरणों से मलते हुए कहा— “मेरी बीवी भी मर गई महाराज!  पहले मेरी फ़सल गई, मेरे खेत गये, फिर मेरे बच्चे गये और आज मेरी पत्नी भी चल बसी| मेरे जीवन का आख़िरी सहारा भी छीन गया देवता| अब मैं क्या करूँ?”

देवता देर तक मौन रहे| उनके पुराने तथा गम्भीर चेहरे पर सोच-विचार और चिन्ता की रेखाएँ उभर आयीं| फिर धीरे धीरे उनकी मुखाकृति पर एक विचित्र-सी मुस्कराहट फैल गई| वो नर्म, गम्भीर तथा सहानुभूति से भरे स्वर में बोले—

“जब तू अपनी बीवी की चिता जलाकर वापस आ रहा था तो क्या तूने घाट के किनारे जूही के फूल देखे थे?”

“हाँ!  देखे थे।” किसान ने उत्तर दिया। “किन्तु जूही के फूलों का मेरी पत्नी की मृत्यु से क्या सम्बन्ध?”

देवता ने समझाते हुए कहा—”जहाँ चिता जलती है|  वहाँ जूही के फूल भी होते हैं|”

यह बात किसान की समझ में नहीं आयी| वह अपनी पत्नी की मौत से पागल हो रहा था| उसने पूरी शक्ति से देवता के पाँव पकड़ लिए| फिर दुख और क्रोध के भाव से व्याकुल होकर वह चीख़ पड़ा—

“पर महाराज!  वह मेरी पत्नी थी, मेरी पत्नी मेरे दिल का आख़िरी सहारा!  आज वह सहारा भी जाता रहा, देवता|”

देवता ने उत्तर दिया— “और जब तू चिता जलाकर वापस अपने घर जा रहा था तो क्या तूने रास्ते में गाँव के कुँए पर कुँवारियों को पानी भरते नहीं देखा था| उनकी आँखों का निःशब्द सन्देश, उनकी मीठी बातों की सुगन्ध, उनके नखशिख की रुपहली गूँज क्या तुझे याद नहीं?”

 

देवता चुप हो गये| किसान देर तक उनके चेहरे को देखता रहा| और जब देवता के मुँह से और कुछ न निकला तो वह खीज कर देवता के चरणों से उठ खड़ा हुआ और लपक कर उसने देवता को गरदन से पकड़ लिया और पूरी शक्ति से उनका सिर पीपल के पेड़ से टकरा दिया| देवता के माथे से ख़ून की धार फुट पड़ी| और वह भयभीत होकर चिल्लाया—

“हाय!  मेरा सिर फट गया|”

किसान बोला—”सिर फट गया तो क्या हुआ| वह देखो आकाश पर अबाबीलें उड़ी जा रही हैं|” और यह कहकर उसने गुजगुज देवता के जबड़े पर दो घूँसें दे मारे|

“हाय!  मेरे दाँत टूट गये” गुजगुज देवता पीड़ा से व्याकुल होकर चिल्लाया—

“दाँत टूट गये तो क्या हुआ?”  किसान दाँत पीस कर बोला—”वह देखो पीपल से परे, तलाब के किनारे कैसे-कैसे फूल खिले हैं|”

और यह कहकर किसान ने देवता का हाथ मोड़कर इस प्रकार तोड़ डाला जैसे किसी व्रक्ष की टहनी!

देवता चीख़ कर बोला—

“हाय!  मेरा हाथ टूट गाया|”

“हाथ टूट गया तो क्या हुआ?”  किसान क्रोध में भर कर चिल्लाया—”शुक्र करो की तुम अन्धे नहीं हो|”

और उस दिन से भगवान ने निश्चय किया की सब देवता पत्थर के होंगे और मुँह से कुछ नहीं बोलेंगे|

 

नई सदी की कहानियों

कृष्ण कुमार चड्डा

हार्पर हिंदी

२०१४

 

The [small] god and the farmer

Krishan Chandar

 

This is something from the times when the smaller gods, or devta¹, used to go around with people and live among them.  Devta would speak, walk, eat and drink with people, and help them in times of crisis.  People honoured and respected them.  They were worshiped for their wisdom and skill.  The public came to them with all their sorrows.  At that time gods were not far from humans.

In those days, at Dhodha Kalan farmstead number 218 in Hoshiyaapur District, a devta used to stay in the branches of a peepal tree, his name was Gujguj.  On his body, instead of ashes, he spread burnt vermillion.  People could see from far away the red colour of his body as he sat in the branches of the peepal tree.  Any time a serious crisis happened, people would come running to him, sing his name, offer flowers, and receive his blessings.  Other devta did live in nearby settlements but Gujguj was the most famous and popular.  Most people came to him.

At that time, at Dhodha Kalan farmstead number 218 in Hoshiyaapur District, a poor peasant also used to stay.  From the perspective of money and wealth he had nothing, in character he was very simple and meek.  He would just go around with his head bowed.  He was very respectful.  When he did speak, his tone was humble and soft as honey.  Till today no one had heard as much as a curse from his mouth.  He had the least land in the village.  Aside from a pair of oxen he had no other property.  His thatched hut too was the smallest.  Still, no-one heard anything but words full of gratitude and patience from him.  He was a very hardworking and virtuous person.  And was happily wrapped-up in with his small farm, small house and lovely wife and children.  Gujguj devta was very pleased with him.  When it was time to explain things to people, he often gave him as an example.

Then one day on a hot afternoon, the farmer presented himself at Gujguj’s feet.  With his hands joined, he started to talk—

“Oh Lord!  A terrible thing has happened to me.  A swarm of locusts has come and eaten all my crops.  They didn’t land on any other farmer’s fields.  They have attacked only my fields and ruined all my green harvest.  Your Highness!  I’ve been robbed, ruined, destroyed!  What will my family and I eat now?”

When devta Gujguj had heard the farmer’s complaint he opened his eyes and said in a satisfied tone—

“When the locust swarm had eaten your field and was flying away did you not see at that time the clouds hovering in the sky and feel in your chest the message of a new season unfolding?”

The farmer did not answer, left the devta’s feet and went away.

One year later again the farmer, pulling his hair and yelling, was again standing in front of Gujguj with his hand clasped.  He said, crying—

“Gujguj devta!  The river has flooded, someone’s hut is broken, somebody’s oxen are drowned but my three fields have been swept away by the flood.  Oh lord!  Those three fields were all I had.  Now my kids will be without even a single grain of rice!”

The devta said—“Those without wealth can grow, they cultivate sorghum2 and wheat and give thanks to God that their bellies are full.”

After hearing the devta’s speech the farmer was satisfied and went back with his head bowed.

Two years later both the farmer’s children died of cholera.  One boy, one girl.  Carrying their corpses on his chest and crying bitterly, he came to the devta and with his hands joined said in a sunken tone—

“Both my children have died Lord!  Both my children have died!  For God’s sake, give them life.”

Gujguj devta said— “Those who die, can’t be alive.  Death is for all.  In the end everyone forgets the sorrow of death.”

“Hey!  I’ve become childless.  Gujguj devta!”  The farmer said crying— “Both my children have died.”

Gujguj cast a sharp look in the farmer’s direction and said—

“In heavy rains flowers bloom on the most barren earth and your good wife is young, beautiful and fertile.”

The devta’s answer left the farmer speechless.  But his soul was satisfied.  He lifted the corpses of his dead children’s on his chest and went away.

At least six years must have passed before he was at the devta’s feet again, ripping his clothes and weeping.  Tear were flowing down his face.

“What is it?”  The devta asked him.

“My wife—” The farmer, placing his face, wet with tears, on the devta’s feet and said—“My wife too has died Lord!  First my crop went, my field went, then my children went and today my wife too has passed away.  My life’s last support has been snatched from me devta.  Now what can I do?”

The devta kept silent some time.  Lines of thought and worry emerged on his old and serious face.  Then very slowly a strange smile spread across his face.  In a tone very soft, serious and full of sympathy he said—

“When you had burnt your wife’s pyre and were coming back, did you see the jasmine flowers just on the edge of the ghat?”

“Yes!  I saw them” the farmer replied.  “But what have jasmine flowers got to do with my wife’s death?”

The devta explained—

“Where pyres are burnt, jasmine flowers are also.”

The farmer couldn’t understand this.  He was becoming mad after his wife’s death.  He gripped the devta’s feet with all his strength.  Then torn with anger and sorrow, he heard himself screaming—

“But lord!  She was my wife, my wife was my heart’s last refuge!  Today her help too has gone, devta.”

The devta replied—“When you had burnt her pyre and were coming back home, did you not see the maidens collecting water at the village well.  Don’t you remember the silent message of their eyes, the fragrance of their sweet words, the silver echoes of their mischief?”

The devta became silent.  The farmer watched his face for a while.  When nothing else came from the devta’s mouth he stood up in irritation, jumped, grabbed the devta‘s neck and smashed his head against the peepal tree with all his strength.  Blood spurted from the devta’s forehead.  He screamed in fear—

“Hey!  My head is bleeding.”

The farmer said—“Banged head, so what.  Look in the sky swallows are flying.”  After saying this he punched Gujguj devta in the mouth.  Twice.

“Ungf!  My teeth are broken” Gujguj devta screamed, shaken with fear—

“Broken teeth, so what?”  The farmer said between gritted teeth—“See there beyond the peepal tree, at the side of the pond how the flowers bloom.”

After saying this the farmer twisted the devta’s hands and, like snapping twigs from a tree, broke them.

The devta howled—

“Aaiii!  My hands are broken.”

“Broken hands, so what?”  The farmer shouted full of anger—“Be thankful that you’re not blind.”

God decided that day that all devta would be stone and their mouths would say nothing.

 

Stories of the New Century

Krishna Kumar Chadda (ed.)

Harper Hindi

2014

 

Thanks Layli for the help!

 

¹ https://en.wikipedia.org/wiki/Devata

2jvaar also means flood

 

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