Two poems by Uday Prakash

वसंत

रेल गाड़ी आती है
और बिना रुके
चली जाती है

जंगल में
पलाश का एक गार्ड
लाल झाड़िया
दिखाता रह जाता है

 

Spring     

Train is coming

moves

unstopping

 

In the jungle

a guard of palash      [tree in picture]

red flags

is showing

 

 

दिल्ली 

समुद्रा के किनारे
अकेले नारियल के पेड़ की तरह है
एक अकेला आदमी इस शहर में.

समुद्रा के ऊपर उड़ती
एक अकेली चिड़िया का कंठ है
एक अकेले आदमी की आवाज़

कितनी बड़ी-बड़ी इमारतों हैं दिल्ली में
असंख्य जगमग जहाज
डगमगाते हैं चारों और रात भर
कहाँ जा रहे होंगे इनमें बैठे तिज़ारती
कितने जवाहरात लदे होंगे इन जहाज़ों में
कितने ग़ुलाम
अपनी पिघलती चरबी की ऊष्मा में
पतवारीं पर थक कर सो गए होगे.

ओनसिस! ओनसिस!
यहाँ तुम्हारी नागरी में
फिर से है एक अकेला आदमी.

 

Delhi

 

A coconut tree

Beside the ocean,

A lone man in this city.

 

Like the cry of a single bird

Flying above the sea,

A lone man’s voice.

 

How many vast buildings in Delhi?

Uncountable dazzling ships

Swaying all night

Where will they go with seated merchants?

How many loads of jewels will be in the ships?

How many slaves?

Calories in their melted fat?

Accountant will tire and sleep.

 

Onassis!  Onassis!

Here in your city

Still one lone man.

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